
सकट चौथ क्या है?
सकट चौथ को संकष्टी चतुर्थी भी कहा जाता है। यह व्रत माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है। इस दिन विशेष रूप से भगवान गणेश और माता सकट की पूजा की जाती है। मान्यता है कि यह व्रत रखने से संतान की रक्षा, लंबी आयु और जीवन के संकटों से मुक्ति मिलती है।
भारत के कई हिस्सों में यह व्रत माताएं अपनी संतान के लिए निर्जल या फलाहार रहकर करती हैं।
🌙 सकट चौथ व्रत का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सकट चौथ का व्रत—
- संतान पर आने वाले संकटों को दूर करता है
- संतान को दीर्घायु और स्वस्थ जीवन देता है
- घर में सुख-शांति और समृद्धि लाता है
- भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है
इस दिन चंद्र दर्शन के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है।
📖 सकट चौथ व्रत कथा (Sakat Chauth Vrat Katha)
पौराणिक कथा के अनुसार, एक नगर में एक निर्धन ब्राह्मण परिवार रहता था। उस परिवार में एक छोटा बालक था, जो अत्यंत बीमार रहने लगा। माता-पिता ने कई उपाय किए, लेकिन बच्चे की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ।
एक दिन माता को स्वप्न में माता सकट ने दर्शन दिए और कहा—
“माघ मास की कृष्ण चतुर्थी को मेरा व्रत रखो और सच्चे मन से भगवान गणेश की पूजा करो।”
माता ने पूरी श्रद्धा से सकट चौथ का व्रत रखा, दिनभर उपवास किया और रात में चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया। व्रत के प्रभाव से बालक शीघ्र ही स्वस्थ हो गया।
तभी से यह मान्यता प्रचलित हुई कि सकट चौथ का व्रत संतान के संकटों को दूर करता है और जीवन में सुख-समृद्धि लाता है।
🪷 सकट चौथ पूजा विधि (संक्षेप में)
- प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें
- पूरे दिन उपवास रखें (निर्जल या फलाहार)
- शाम को भगवान गणेश की पूजा करें
- दूर्वा, मोदक और रोली-चावल अर्पित करें
- रात में चंद्र दर्शन कर अर्घ्य दें
- इसके बाद व्रत का पारण करें
🌸 सकट चौथ व्रत में क्या करें और क्या न करें
✔️ क्या करें
- मन, वचन और कर्म से शुद्ध रहें
- संतान के कल्याण की कामना करें
- कथा अवश्य सुनें या पढ़ें
❌ क्या न करें
- व्रत के दिन क्रोध और नकारात्मक विचारों से बचें
- बिना चंद्र दर्शन के व्रत न खोलें
🔔 सकट चौथ व्रत से जुड़ी मान्यताएं
धार्मिक विश्वास है कि जो महिलाएं नियमित रूप से सकट चौथ का व्रत करती हैं, उनके घर में कभी संतान कष्ट नहीं होता और भगवान गणेश सदैव रक्षा करते हैं।
✨ निष्कर्ष
सकट चौथ व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि मां की आस्था, धैर्य और संकल्प का प्रतीक है। यह व्रत संतान सुख और जीवन के संकटों से मुक्ति का संदेश देता है।