दो संतों में हो रहा था विवाद- किसकी भक्ति श्रेष्ठ:प्रेरक प्रसंग: सच्ची सफलता वही है, जिसमें मन शांत हो, विचार शुद्ध हों और कर्म ईमानदार हों

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एक लोक कथा है। पुराने समय में एक आश्रम में दो संत साथ रहते थे। दोनों परम भक्त थे, लेकिन उनकी भक्ति के तरीके अलग-अलग थे। एक संत दिन-रात कठिन तपस्या करता, लंबा ध्यान लगाता और मंत्र जप में लीन रहता। वह मानता था कि कठोर साधना से ही ईश्वर प्रसन्न होते हैं। दूसरा संत भक्ति सरलता और विश्वास के साथ करता था। वह रोज सुबह-शाम भगवान को भोग लगाता, श्रद्धा से प्रार्थना करता और फिर स्वयं भोजन करता। एक दिन दोनों संतों के बीच विवाद हो गया। विवाद इस बात का था कि दोनों में बड़ा संत कौन है? बहस बढ़ने लगी, तभी वहां उनके गुरु पहुंचे। उन्होंने झगड़े की वजह पूछी। दोनों संतों ने अपनी-अपनी भक्ति को श्रेष्ठ बताया। गुरु ने कहा कि मैं इसका फैसला कल कर दूंगा कि आप दोनों में श्रेष्ठ कौन है। अगले दिन गुरु ने मंदिर में दोनों संतों के आसन के पास सोने की एक-एक अंगूठी रख दी। पहले तपस्या करने वाला संत आया। उसकी नजर अंगूठी पर पड़ी, तो उसने सोचा कि इतनी कीमती अंगूठी मिलना सौभाग्य है। किसी को पता नहीं चलेगा, ये सोचकर उसने अंगूठी अपने आसन के नीचे छिपा ली और फिर मंत्र जप करने लगा। कुछ समय बाद दूसरा संत आया। उसने भी अंगूठी देखी, लेकिन उसका मन विचलित नहीं हुआ। उसने भगवान को भोग लगाया, प्रार्थना की और भोजन करने लगा। उसके मन में अंगूठी का कोई लालच नहीं था। उसका भरोसा था कि भगवान उसके लिए सभी जरूरी व्यवस्था करते रहेंगे। थोड़ी देर बाद गुरु वहां पहुंचे। उन्होंने मंत्र जप करने वाले संत से खड़े होने के लिए कहा, जैसे ही वह खड़ा हुआ, उसके आसन के नीचे छिपी अंगूठी दिख गई। गुरु ने कहा कि सच्चा संत वही है, जिसका मन पवित्र है, जो बुरे विचारों से बचा रहता है। भोग लगाने वाला संत बड़ा है, क्योंकि उसके मन में लालच नहीं है। जबकि मंत्र जप करने वाले संत के मन में लालच है, इसलिए उसकी भक्ति श्रेष्ठ नहीं है। प्रसंग की सीख मन में उठने वाले अच्छे-बुरे विचार ही हमारे कर्म तय करते हैं। अगर विचार गलत हैं, तो अच्छे काम भी अर्थहीन हो जाते हैं। इसलिए रोज अपने विचारों पर ध्यान दें। विचारों में सकारात्मकता बनाए रखना चाहिए। बाहरी सफलता से ज्यादा जरूरी है- संतोष। गलत रास्ते से मिली चीजें मन को अशांत करती हैं, जबकि ईमानदारी से किया गया काम आत्मविश्वास बढ़ाता है। दूसरे संत की तरह जीवन में भरोसा जरूरी है। खुद पर और भगवान पर भरोसा रखें। हर बात की चिंता करने के बजाय ये मानें कि मेहनत और ईमानदारी का फल जरूर मिलता है, इसलिए धैर्य के साथ अपने काम करते रहें। चाहे पूजा हो या प्रोफेशनल लाइफ, अगर मन में लालच, ईर्ष्या, छल जैसे बुरे विचार हैं, तो सफलता लंबे समय तक टिक नहीं पाती है। इसलिए इन बुराइयों से बचना चाहिए। जीवन में लाभ कमाने के कई अवसर आते हैं, लेकिन हर अवसर सही नहीं होता। सही-गलत की पहचान करके अवसरों का लाभ उठाना चाहिए। लालच से बचें और धर्म के मुताबिक काम करते रहें। जितना जीवन सरल होगा, मन उतना शांत रहेगा। अनावश्यक इच्छाएं तनाव बढ़ाती हैं। इसलिए इच्छाओं को नियंत्रित रखें और लालच जैसी बुराइयों से दूर रहें। रोज अपने काम के बारे में आत्ममंथन करते रहना चाहिए। अच्छे-बुरे कामों के बारे में सोच-विचार करें। बुरे कामों से सीख लें और अच्छे काम करते रहें। धन, काम, भक्ति, परिवार और स्वास्थ्य इन सभी में संतुलन बनाए रखना जरूरी है। अगर इन बातों का संतुलन बिगड़ता है, तो जीवन अशांत हो जाता है। सच्ची सफलता वही है, जिसमें मन शांत हो, विचार शुद्ध हों और कर्म ईमानदार हों। यही जीवन प्रबंधन की सबसे बड़ी कला है।

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