ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म स्विगी का अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में नेट लॉस यानी शुद्ध घाटा सालाना आधार पर 33% बढ़कर ₹1,065 करोड़ रहा। पिछले साल की समान तिमाही में कंपनी को ₹799 करोड़ का घाटा हुआ था। वहीं कंपनी के ऑपरेशनल रेवेन्यू में 54% की बढ़ोतरी हुई है। वित्त वर्ष 26 की तीसरी तिमाही में कंपनी का ऑपरेशनल रेवेन्यू 6,148 करोड़ रुपए रहा। पिछले साल की समान तिमाही में कंपनी ने ₹3,993 करोड़ का रेवेन्यू जनरेट किया था। स्विगी के रिजल्ट की 4 बड़ी बातें इंस्टामार्ट की ग्रोथ बढ़ी: स्विगी के ‘इंस्टामार्ट’ बिजनेस ने सबसे अच्छा प्रदर्शन किया है। इसकी कुल बिक्री पिछले साल के मुकाबले दोगुनी (103%) होकर ₹7,938 करोड़ हो गई है। लोग अब न सिर्फ ज्यादा ऑर्डर कर रहे हैं, बल्कि उनके ऑर्डर का साइज भी बड़ा (औसत ₹746) हो गया है। फूड डिलीवरी में भी मजबूती: खाना मंगवाने वाले बिजनेस में पिछले 3 साल की सबसे तेज बढ़त देखी गई। इसकी बिक्री 20.5% बढ़ी है। अब हर महीने स्विगी से खाना मंगवाने वाले एक्टिव ग्राहकों की संख्या बढ़कर 1.81 करोड़ हो गई है। डार्क स्टोर्स की संख्या बढ़ी: स्विगी ने अपने डार्क स्टोर्स (जहां सामान स्टोर किया जाता है) की संख्या बढ़ाकर 136 कर दी है, जो अब देश के 31 शहरों में फैले हुए हैं। कंपनी ने अपने स्टोर्स का साइज भी बड़ा किया है ताकि ग्राहकों को ज्यादा वैरायटी का सामान मिल सके। खर्चों ने बढ़ाई टेंशन: कंपनी का घाटा बढ़ने की मुख्य वजह उसके बढ़ते ऑपरेशनल खर्चे हैं, जो 49% बढ़कर ₹7,298 करोड़ हो गए हैं। कंपनी विज्ञापन, नेटवर्क विस्तार और डिलीवरी पर काफी पैसा खर्च कर रही है, जिससे कमाई बढ़ने के बावजूद घाटे में है। कंपनी की बेंगलुरु से हुई शुरुआत स्विगी की शुरुआत बेंगलुरु के कोरामंगला से हुई थी। फाउंडर्स नंदन रेड्डी और श्रीहर्षा मजेटी ने कुछ डिलीवरी पार्टनर और लगभग 25 रेस्टोरेंट से जुड़कर कंपनी शुरू की। उस वक्त स्विगी ऐप पर मौजूद नहीं था। इसलिए लोग उसकी वेबसाइट पर जाकर अपने मनपसंद रेस्टोरेंट को चुनकर फूड ऑर्डर करते थे। स्विगी की सर्विस लोगों को काफी अच्छी लगने लगी और इससे कंपनी को पहचान मिलनी शुरू हो गई। कंपनी ने 2015 के शुरुआती महीनों में खुद का ऐप लॉन्च किया। ऐप की मदद से फूड ऑर्डर करना कस्टमर के लिए आसान हो गया। भारत की सबसे तेज यूनिकॉर्न स्विगी भारत की सबसे तेज यूनिकॉर्न बनने वाली कंपनी है। यूनिकॉर्न तक का सफर तय करने में कंपनी को 4 साल से भी कम समय लगा। 2014 में शुरू हुई कंपनी 2018 तक 10 हजार करोड़ की वैल्यूएशन वाली कंपनी बन गई थी।
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