एपल का लॉन्चिंग इवेंट कल यानी बुधवार देर रात होगा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कंपनी इसमें आईफोन 18 प्रो, प्रो मैक्स और अल्ट्रा लॉन्च कर सकती है। लेकिन नए आईफोन से पहले जानते हैं उस नाम और फोन की कहानी, जिसने करीब दो दशक में मोबाइल की दुनिया बदल दी। आपको जानकर हैरानी होगी कि आईफोन नाम शुरू में एपल का था ही नहीं। अमेरिकी नेटवर्किंग कंपनी सिस्को के पास इस नाम का ट्रेडमार्क था। एपल के आईफोन लॉन्च करने के बाद सिस्को ने कंपनी के खिलाफ केस भी किया। बाद में दोनों कंपनियों में समझौता हुआ और दोनों को आईफोन नाम इस्तेमाल करने की अनुमति मिल गई। एक और दिलचस्प बात यह है कि दुनिया का सबसे महंगा आईफोन करीब 1.5 करोड़ डॉलर यानी आज के हिसाब से करीब ₹142 करोड़ में बिका था। इसे ब्रिटिश डिजाइनर स्टुअर्ट ह्यूज ने कस्टमाइज किया था। इसमें 135 ग्राम 24 कैरेट सोना और 600 सफेद हीरे लगाए गए थे। होम बटन की जगह 24 कैरेट का काला हीरा लगाया गया था। लेकिन एक नाम और एक बेहद महंगे मॉडल से कहीं बड़ी है आईफोन की कहानी। करीब दो दशक पहले एपल ने ऐसा फोन पेश किया, जिसने मोबाइल इस्तेमाल करने का तरीका ही बदल दिया। ऐसे शुरू हुई आईफोन की कहानी 9 जनवरी 2007, सैन फ्रांसिस्को में स्टीव जॉब्स एक मंच पर खड़े थे। हाथ में एक नया डिवाइस था। जॉब्स ने इसे तीन चीजों का मेल बताया- मोबाइल फोन, टच वाला आईपॉड और इंटरनेट कम्युनिकेशन डिवाइस। यही था पहला आईफोन। उस समय इसमें न 5G था, न एप स्टोर, न फेस आईडी, और न ही एआई। लेकिन इसकी 3.5 इंच की टचस्क्रीन ने फोन चलाने का तरीका बदल दिया। टैप, स्वाइप और पिंच से फोन चलने लगा। बटन और कीपैड की जरूरत खत्म हो गई। इसने इंटरनेट के इस्तेमाल का भी तरीका बदल दिया। आईफोन से पहले फोन में जो इंटरनेट चलता था, उसे ‘WAP’ कहते थे। उसमें वेबसाइट्स बहुत खराब और कटी-फटी दिखती थीं। एपल ने अपने सफारी ब्राउजर की मदद से पहली बार मोबाइल पर ठीक वैसी ही असली वेबसाइट्स दिखाईं, जैसी कंप्यूटर पर दिखती थीं। पहला आईफोन जून 2007 में बाजार में आया और सिर्फ 74 दिनों में इसकी 10 लाख यूनिट बिक गईं। उस वक्त शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह छोटा सा डिवाइस आने वाले सालों में एपल की सबसे बड़ी ताकत बन जाएगा। करीब दो दशक बाद अब आईफोन की कहानी एक और बड़े मोड़ पर है। स्टीव जॉब्स नहीं हैं। टिम कुक भी अब CEO नहीं हैं। अब एपल की कमान जॉन टर्नस के हाथ में है। उन्हें 1 सितंबर 2026 को एपल का CEO बनाया गया। वे करीब 25 साल से एपल में काम कर रहे हैं। आईफोन बेहद महंगे होने के बावजूद दुनिया में अब तक 300 करोड़ से ज्यादा बिक चुके हैं। इनमें से 250 करोड़ से ज्यादा एक्टिव हैं। 2018 में यह संख्या करीब 130 करोड़ थी। यानी सिर्फ 8 साल में करीब 120 करोड़ की बढ़ोतरी हुई। कल यानी 9 सितंबर को एपल का लॉन्चिंग इवेंट है। अब सवाल यह है कि टर्नस के दौर में आईफोन किस दिशा में जाएगा? इस सवाल का जवाब समझने के लिए पहले पीछे चलना होगा। चैप्टर-1 अचानक गायब होने लगे थे इंजीनियर्स साल 2004-05 में एपल के ऑफिस में कुछ अजीब हो रहा था। कंपनी के कुछ सबसे काबिल इंजीनियर्स अचानक अपने पुराने काम से गायब होने लगे। उनके साथ काम करने वाले लोगों को भी नहीं पता था कि वे आखिर कहां जा रहे हैं और क्या कर क्या रहे हैं। दरअसल, एपल ने कूपर्टीनो में एक अलग बिल्डिंग लेकर वहां एक सीक्रेट लैब बनाई थी। चुनिंदा इंजीनियर्स को इसी लैब में भेज दिया गया। दरवाजे बंद रहते थे। काम की कोई तय शिफ्ट नहीं थी। इंजीनियर्स दिन-रात इसी प्रोजेक्ट में जुटे रहते। कई बार खाना भी वहीं खाते और वहीं सो जाते। इस पूरे प्रोजेक्ट का नाम था- ‘पर्पल’। करीब ढाई साल तक यह प्रोजेक्ट पूरी तरह गोपनीय रखा गया। फिर आया 9 जनवरी 2007… सैन फ्रांसिस्को के मॉस्कोन सेंटर में स्टीव जॉब्स मंच पर पहुंचे। उन्होंने हाथ में एक नया डिवाइस लिया और दुनिया के सामने उसे पेश किया। तब जाकर एपल के उन इंजीनियर्स के गायब होने का राज खुला। वे इतने सालों से जिस प्रोजेक्ट पर दिन-रात काम कर रहे थे, वह था- आईफोन। चैप्टर-2 जब फोन सिर्फ फोन नहीं रहा 2007 में जब एपल ने पहला आईफोन पेश किया, तब स्मार्टफोन की दुनिया में नोकिया और ब्लैकबेरी जैसे बड़े नाम पहले से मौजूद थे। ज्यादातर फोन में बटन और कीपैड हुआ करते थे। एपल ने कहा- कीपैड की जरूरत क्यों है? फोन की स्क्रीन को ही कीपैड बना देते हैं और यहीं से कहानी बदल गई। पहले आईफोन में 3.5 इंच की टचस्क्रीन थी। इसमें कीपैड नहीं था, बल्कि 2 मेगापिक्सल का कैमरा, वाईफाई, ब्लूटूथ और इंटरनेट कनेक्शन था। खास बात थी कि पूरी स्क्रीन ही फोन चलाने का तरीका बन गई। उंगली से टैप करो, स्क्रीन पर स्वाइप करो और दो उंगलियों से फोटो को बड़ा या छोटा कर दो। आज ये चीजें हमें बिल्कुल सामान्य लगती हैं, लेकिन उस समय फोन चलाने का यह तरीका काफी नया था। यही आईफोन का पहला बड़ा इनोवेशन था। फोन हमारी उंगली के इशारों से चलने वाला छोटा कंप्यूटर बन गया। 4GB मॉडल की कीमत 499 डॉलर और 8GB मॉडल की कीमत 599 डॉलर थी। चैप्टर-3 पहली बार एप स्टोर आया, स्क्रीन और साफ हुई पहले आईफोन में सबसे बड़ी कमी थी- एप स्टोर नहीं था। आप अपनी पसंद का नया एप डाउनलोड नहीं कर सकते थे। 2008 में आए आईफोन 3G ने यह कमी भी दूर कर दी। इसमें 3G और GPS के साथ एप स्टोर आया, जिसकी शुरुआत 800 से ज्यादा एप्स से हुई। पहले आईफोन को 10 लाख यूनिट बेचने में 74 दिन लगे थे, लेकिन आईफोन 3G ने यह आंकड़ा सिर्फ तीन दिन में हासिल कर लिया। अब आईफोन सिर्फ फोन नहीं, एक ऐसा प्लेटफॉर्म बन चुका था, जिस पर डेवलपर्स एप बना सकते थे। 2010 में एपल ने आईफोन 4 लॉन्च किया। इसमें पहली बार रेटिना डिस्प्ले आया। 3.5 इंच की स्क्रीन में 960×640 पिक्सल और करीब 326 पिक्सल प्रति इंच की डेंसिटी थी। यानी पहली बार फोन की स्क्रीन इतनी साफ दिखने लगी कि पढ़ते समय ऐसा लगता था जैसे अक्षर कागज पर छपे हों। आईफोन 4 में 5 मेगापिक्सल कैमरा, HD वीडियो रिकॉर्डिंग और वीडियो कॉल के लिए फेस टाइम भी आया। इसका असर बिक्री पर भी दिखा। लॉन्च के सिर्फ तीन दिन में 17 लाख आईफोन 4 बिक गए। चैप्टर-5 स्टीव जॉब्स का निधन, टिम कुक के हाथ में कमान 2011 में स्टीव जॉब्स ने एपल के CEO पद से इस्तीफा दिया और कुछ ही समय बाद उनका निधन हो गया। अब कंपनी की कमान टिम कुक के हाथ में थी। जॉब्स के समय सवाल था- क्या नया बनाया जाए? लेकिन कुक के सामने चुनौती थी- आईफोन को दुनिया के करोड़ों लोगों तक कैसे पहुंचाया जाए? कुक ने एपल की सप्लाई चेन और प्रोडक्शन को मजबूत किया। इसका बड़ा असर 2014 में दिखा, जब एपल ने पहली बार बड़े स्क्रीन वाले आईफोन 6 और आईफोन 6 प्लस लॉन्च किए। साथ में एपल पे आया, यानी आईफोन अब सिर्फ फोन नहीं, पैसे रखने और भुगतान करने का जरिया भी बन गया। बाजार ने इस बदलाव को तुरंत स्वीकार किया। पहले तीन दिनों में दोनों मॉडलों की एक करोड़ से ज्यादा यूनिट बिक गईं। 2015 में आया आईफोन 6s, जिसमें 3D टच और लाइव फोटोज जैसे फीचर थे। इसकी भी पहले तीन दिनों में 1.3 करोड़ से ज्यादा यूनिट बिक गईं। चैप्टर-6 होम बटन गायब, कैमरा फोन की नई पहचान बना फिर आया 2017, आईफोन की दसवीं सालगिरह पर एपल ने आईफोन X लॉन्च किया। इस बार कंपनी ने अपनी सबसे पुरानी पहचान हटा दी- होम बटन। उसकी जगह 5.8 इंच की OLED स्क्रीन ने ले ली और पहली बार फेस आईडी का फीचर आया। अब फोन खोलने के लिए बटन दबाने की जरूरत नहीं थी, बस फोन को देखना था। इसके लिए TrueDepth कैमरा चेहरे का 3D नक्शा बनाता था। अब आईफोन की अगली बड़ी लड़ाई कैमरे को लेकर थी। 2019 में आईफोन 11 में नाइट मोड और अल्ट्रा वाइड कैमरा आया। फोन अब सिर्फ कैमरे से तस्वीर नहीं खींच रहा था, बल्कि उसका प्रोसेसर और सॉफ्टवेयर मिलकर तस्वीर को बेहतर बना रहे थे। 2007 में आईफोन ने कहा था- “फोन को कंप्यूटर जैसा बनाओ।” 2019 तक वह कह रहा था- “फोन के अंदर कंप्यूटर को इतना ताकतवर बनाओ कि वह कैमरे को भी बदल दे।” चैप्टर-7 पहली बार 5G की दुनिया में एंट्री 2020 में कोरोना महामारी के बीच एपल ने आईफोन 12 लॉन्च किया। पहली बार आईफोन में 5जी आया। इंटरनेट तेज हुआ, वीडियो स्ट्रीमिंग और ऑनलाइन गेमिंग बेहतर हुई। लेकिन असली बदलाव फोन के अंदर था। इसमें A14 बायोनिक चिप लगी थी, जिसने आईफोन की स्पीड बढ़ाई। साथ ही 16-कोर न्यूरल इंजन था, जो एआई और मशीन लर्निंग जैसे काम फोन पर ही करने में मदद करता था। आईफोन अब तेज हो चुका था। ताकतवर भी। अब सवाल था- वह ऐसा क्या कर सकता है, जो पहले किसी फोन ने नहीं किया 2022: आईफोन 14 के साथ एपल ने इमरजेंसी एसओएस वाया सैटेलाइट दिया। मोबाइल नेटवर्क और वाईफाई न होने पर भी आईफोन सैटेलाइट के जरिए इमरजेंसी सर्विस को संदेश भेज सकता था। इसके लिए एपल ने सैटेलाइट इंफ्रास्ट्रक्चर में 45 करोड़ डॉलर लगाए। 2023: आईफोन 15 में एपल ने लाइटनिंग पोर्ट हटाकर USB-C दे दिया। अब आईफोन, मैक और आईपैड एक ही केबल से चार्ज हो सकते थे। आईफोन 15 प्रो में टाइटेनियम बॉडी और ए17 प्रो चिप भी आई, जिससे गेमिंग और भारी काम आसान हुए। 2024: आईफोन 16 के साथ कंपनी ने एपल इंटेलिजेंस पेश किया। A18 चिप और कैमरा कंट्रोल जैसे फीचर भी आए। अब आईफोन सिर्फ आदेश मानने वाला फोन नहीं था, बल्कि आपकी जरूरत समझकर मदद करने की दिशा में बढ़ रहा था। 2025: आईफोन 17 के साथ आया आईफोन एयर, जिसकी मोटाई सिर्फ 5.6 मिलीमीटर थी। बड़ी स्क्रीन और A19 प्रो चिप के साथ एपल ने दिखाया कि अब उसका फोकस कम जगह में ज्यादा टेक्नोलॉजी फिट करने पर भी था। अब आईफोन की आगे की कहानी जॉन टर्नस के हाथ में है। जॉन टर्नस का एपल से 25 साल पुराना रिश्ता जॉन टर्नस एक मैकेनिकल इंजीनियर हैं, जिन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया से पढ़ाई की है। वे 2001 में एपल से जुड़े हैं। एपल में आने से पहले उन्होंने चार साल ‘वर्चुअल रिसर्च सिस्टम्स’ में काम किया था। एपल में उन्होंने अपनी शुरुआत बहुत बेसिक लेवल से की थी। मैक स्क्रीन डिजाइनिंग से शुरुआत के बाद धीरे-धीरे कंपनी की हार्डवेयर टीम के सबसे बड़े अफसर बन गए। कंपनी के मुताबिक, टर्नस की लीडरशिप में मैक, आईफोन, एयरपॉड्स और दूसरे हार्डवेयर में मजबूती, बेहतर मटेरियल और आसानी से रिपेयर किए जा सकने वाले डिजाइन पर काम हुआ। उन्होंने कंपनी में जॉब्स के दौर को भी देखा है और टिम कुक के साथ भी काम किया है। जॉन टर्नस के सामने चार चुनौतियां होंगी ग्राफिक्सः अंकित पाठक References and Further Readings…
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