आपने भरा ज्यादा प्रीमियम, फायदा एजेंट को मिला:नियम बदलेगा बीमा नियामक, कमीशन की सीमा तय होगी; ज्यादा रकम इन्वेस्ट होगी

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अगर आप नई इंश्योरेंस पॉलिसी लेने की सोच रहे हैं, तो यह खबर आपकी बचत से जुड़ी है। देश में बीते एक दशक से प्रीमियम लगातार महंगा होता गया, पर कवरेज का दायरा नहीं बढ़ा। वजह यह है कि बीमा कंपनियां बिजनेस बढ़ाने से ज्यादा ध्यान ब्रोकर्स को कमीशन बांटने पर देती रहीं। अब बीमा नियामक इसे बदलने की तैयारी में है। IRDAI के नए प्रस्ताव के तहत अब ब्रोकर्स के पहले साल के कमीशन की अधिकतम सीमा तय की जाएगी। इससे कंपनियों का खर्च कम होगा और आपके प्रीमियम का ज्यादा पैसा निवेश में लगेगा, जिससे आपको बेहतर रिटर्न मिलेगा। 5 साल में मैनेजमेंट खर्च घटाकर 12.5% तक करना होगा वर्तमान में इंश्योरेंस कंपनियों के लिए मैनेजमेंट खर्च की सीमा 30% तक है। बीमा नियामक ने इसे चरणबद्ध तरीके से कम करने का प्रस्ताव दिया है। IRDAI का मानना है कि 2023 में कंपनियों को खर्चों में जो छूट दी गई थी, उससे ग्राहकों को कोई फायदा नहीं मिला। कंपनियां प्रीमियम तो बढ़ाती रहीं, लेकिन ग्राहकों की संख्या नहीं बढ़ी। देश की GDP बढ़ी, पर पॉलिसी ग्रोथ शून्य बीते 10 साल में GDP औसतन 10% की दर से बढ़ी। इसी दौरान लाइफ इंश्योरेंस का कारोबार 10% और जनरल इंश्योरेंस 13% की रफ्तार से ही आगे बढ़ सका। आमदनी और अर्थव्यवस्था बढ़ने के बावजूद इंश्योरेंस लेने वालों की संख्या में कोई खास उछाल नहीं आया। एजेंट्स का कमीशन 125% तक बढ़ा IRDAI के मुताबिक 2023 में कंपनियों को खर्चों में छूट दी गई थी ताकि पॉलिसियां सस्ती हों और ज्यादा लोग बीमा कराएं, लेकिन इसके उलट प्रीमियम महंगा होता गया। कंपनियों का बिजनेस बढ़ाने से ज्यादा ध्यान डिस्ट्रीब्यूटर्स को भारी कमीशन बांटने पर रहा। प्रीमियम का बड़ा हिस्सा निवेश में लगेगा IRDAI का कहना है कि भारी कमीशन से ग्राहकों के लिए लागत बढ़ जाती है। इससे उन्हें या तो महंगा प्रीमियम चुकाना पड़ता है या इंश्योरेंस प्रोडक्ट से कम फायदा मिलता है। ऐसे में IRDAI ने प्रीमियम पेमेंट टर्म के आधार पर कमीशन कैप करने का प्रस्ताव रखा है। कमीशन में कटौती से पॉलिसीहोल्डर्स की जमा राशि का बड़ा हिस्सा निवेश में लग सकेगा। पॉलिसी टर्म के हिसाब से तय होगा कमीशन
61वें महीने में आधी पॉलिसियां बंद हो जाती हैं IRDAI के आंकड़ों के मुताबिक कंपनियां सिर्फ नई पॉलिसियां बेचने पर ध्यान देती हैं, ग्राहकों को बनाए रखने पर नहीं। लाइफ इंश्योरेंस में 61वें महीने तक आते-आते केवल 48% पॉलिसियां ही चालू रह पाती हैं। यानी आधे से ज्यादा लोग बीच में ही पॉलिसी सरेंडर कर देते हैं।

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